‘Patient No. 47’: सिस्टम ने डिप्टी CM को पहचानने से कर दिया इंकार

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

लखनऊ की एक साधारण सुबह… लेकिन कहानी असाधारण। भीड़ वही, लाइन वही, इंतजार वही। फर्क बस इतना कि इस बार लाइन में खड़ा ‘आम आदमी’ असल में सिस्टम का VIP था। और सिस्टम? उसने बिना पलक झपकाए उसे भी उसी भीड़ में घोल दिया।

“मरीज नंबर 47”: जब सत्ता ने खुद को कतार में खड़ा किया

उप मुख्यमंत्री Brajesh Pathak ने इस बार फाइलों से बाहर निकलकर हकीकत को छूने का फैसला किया।
लखनऊ के चिनहट CHC में वे आम मरीज बनकर पहुंचे, पर्ची कटवाई, लाइन में लगे और करीब एक घंटे तक सिस्टम का ‘टेस्ट’ लेते रहे।

किसी ने पहचाना नहीं। किसी ने पूछा नहीं। और यही इस कहानी का सबसे बड़ा punchline है।

“अस्पताल या अव्यवस्था का अड्डा?”

जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, तस्वीर साफ होती गई। गंदगी ऐसे पसरी थी जैसे उसे कोई हटाने की जिम्मेदारी ही नहीं। स्टाफ की सुस्ती, मरीजों की बेबसी और सिस्टम की चुप्पी… सब कुछ एक फ्रेम में कैद था।

जब सच सामने आया, तो डिप्टी CM का गुस्सा भी उतना ही असली था जितनी वहां की हालत।

“सिस्टम की स्क्रिप्ट फेल”: रियलिटी ने किया एक्सपोज

यह कोई प्लान्ड ड्रामा नहीं था, लेकिन इसका असर किसी ब्लॉकबस्टर सीन से कम नहीं। VIP विजिट में जहां फर्श चमकते हैं और स्टाफ चौकन्ना रहता है, वहां इस ‘अनऑफिशियल एंट्री’ ने असली चेहरा दिखा दिया।

यह वो टेस्ट था जिसमें सिस्टम बिना तैयारी के पकड़ा गया… और फेल हो गया।

इलाज से ज्यादा जरूरी ‘इलाज का अभिनय’

हमारे एडिटर इन चीफ आशीष शर्मा ऋषि कहते हैं, “सरकारी अस्पतालों में समस्या सिर्फ संसाधनों की नहीं है, mindset की है। यहां इलाज कम और ‘इलाज का अभिनय’ ज्यादा होता है। Pathak का यह स्टिंग नहीं, सिस्टम का mirror test है।”

उनकी बात चुभती है, लेकिन सच का स्वाद अक्सर कड़वा ही होता है।

“जवाबदेही का इंजेक्शन”: अब क्या बदलेगा?

डिप्टी CM के इस औचक निरीक्षण के बाद अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं। लेकिन सवाल वही पुराना है, क्या यह बदलाव स्थायी होगा या फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ पहले जैसा? क्योंकि सिस्टम की सबसे बड़ी बीमारी यही है, यह दर्द को भूलने में बहुत तेज है।

“लखनऊ का मैसेज”: लाइन में खड़ा हर आदमी VIP है

इस घटना ने एक बात साफ कर दी, सिस्टम को ठीक करने के लिए कभी-कभी सत्ता को अपनी पहचान छुपानी पड़ती है। और शायद यही सबसे बड़ा सबक है, कि असली सुधार तब शुरू होता है जब ‘VIP’ भी ‘common man’ बनकर दर्द महसूस करे।

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